रीन ओवर मी (2007) Reign Over Me *** - डॉन चीडल, एडम सैंडलर. ड्रामा. सितंबर 11 की हवाई दुर्घटना में अपने परिवार को खो चुके सैंडलर को अरसे बाद अपने कॉलेज का पुराना दोस्त चीडल मिलता है और उसे सामान्य करने की कोशिश करता है. हालाँकि तालियों वाले सीन सैंडलर को मिले हैं और उन्होंने ठीक-ठाक निभाए भी हैं, फ़िल्म की हाइलाइट चीडल का अभिनय है. संयोग है कि कल "11 सितंबर" की बरसी भी है.
कैशबैक (2006) Cashback *** - कॉमेडी, ड्रामा, रोमांस. अनिद्रा का शिकार नायक अपनी कलात्मक परिकल्पनाओं को खुला छोड़ देता है. बढ़िया फ़िल्मांकन और पार्श्वसंगीत वाली यह ब्रिटिश फ़िल्म कई बार अपने फ़्रीज फ़्रेमों के साथ अचंभित कर देती है. सेक्सयुक्त दृश्यों, नग्नता, और भाषा के लिए R-rated.
द लुकआउट (2007) The Lookout *** - जोसफ़ गोर्डन-लेविट, ज़ेफ़ डेनियल्स. अपराध, रोमांच, ड्रामा. एक कार दुर्घटना में दिमागी चोट के बाद युवा नायक एक बैंक में जेनिटर की नौकरी कर रहा है. उसपर एक बैंक लुटेरे गैंग की नज़र पड़ती है और...
मिस्टर ब्रूक्स (2007) Mr. Brooks ***/ - केविन कॉसनर, डेमी मूर, विलियम हर्ट. अपराध, रोमांच, ड्रामा. एक ऐसे आदमी की कहानी जो कभी-कभी अपने पर अपनी ऑल्टर ईगो को हावी होने देता है, जिसे हत्या करना पसंद है. कॉसनर बढ़िया हैं और हर्ट भी. दोनों के बीच का इंटरएक्शन भी मज़ेदार है. रक्तरंजित हिंसा, सेक्सयुक्त दृश्यों, नग्नता, और भाषा के लिए R-rated.
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Monday, September 10, 2007
Wednesday, July 04, 2007
ता'म ए गिलास (1997)
Taste of Cherry (Iran, Persian)
Ta'm e guilass
एक अधेड़ आदमी ख़ुदकुशी करना चाहता है और उसके लिए एक मददगार ढूँढ रहा है. प्लॉट पूरी तरह गले नहीं उतरता और दिलचस्पी घटाता है. दृश्य थोड़े खिंचे हुए हैं. संवाद कुछ जगह अपनी सहजता की वजह से अच्छे लगते हैं पर कई जगह ख़ुदकुशी के ख़िलाफ़ पुराने, घिसे-पिटे तर्कों को गूढ़ विचारों की तरह पेश किया गया है.
ईरानी रेगिस्तान और रेतिस्तान के नारंगी-पीले रंग से भरे फ़्रेम सुंदर लगते हैं. अभिनय, खास कर सहकलाकारों का, इतना अच्छा है कि डॉक्यूमेंट्री का सा एहसास देता है.
नोट्स -
1) पूरी फ़िल्म में तीन सह-कलाकार नायक से कार में बैठे बात करते दिखते हैं. वास्तव में उनमें से दो शूट के दौरान नायक (हुमायूँ इरशादी) से मिले ही नहीं. पर उसके बावजूद धाराप्रवाह कण्टिन्युटी अब्बास क्यारोस्तामी की निर्देशकीय और तकनीकी क्षमता दिखाती है.
2) [चेतावनी: आगे रहस्योद्घाटन है] फ़िल्म का अंत भ्रमित करता है. मंज़र अचानक रंगीन हो जाता है, फ़िल्म क्वालिटी विडियो जैसी हो जाती है और क्यारोस्तामी कैमरे और क्रू के साथ नज़र आते हैं. जैसे कह रहे हों कि ये जो आपने देखा वो बस एक फ़िल्म की शूटिंग थी. या ये कि दिख रहे सच के ऊपर एक और सच है?
Ta'm e guilass
एक अधेड़ आदमी ख़ुदकुशी करना चाहता है और उसके लिए एक मददगार ढूँढ रहा है. प्लॉट पूरी तरह गले नहीं उतरता और दिलचस्पी घटाता है. दृश्य थोड़े खिंचे हुए हैं. संवाद कुछ जगह अपनी सहजता की वजह से अच्छे लगते हैं पर कई जगह ख़ुदकुशी के ख़िलाफ़ पुराने, घिसे-पिटे तर्कों को गूढ़ विचारों की तरह पेश किया गया है.ईरानी रेगिस्तान और रेतिस्तान के नारंगी-पीले रंग से भरे फ़्रेम सुंदर लगते हैं. अभिनय, खास कर सहकलाकारों का, इतना अच्छा है कि डॉक्यूमेंट्री का सा एहसास देता है.
नोट्स -
1) पूरी फ़िल्म में तीन सह-कलाकार नायक से कार में बैठे बात करते दिखते हैं. वास्तव में उनमें से दो शूट के दौरान नायक (हुमायूँ इरशादी) से मिले ही नहीं. पर उसके बावजूद धाराप्रवाह कण्टिन्युटी अब्बास क्यारोस्तामी की निर्देशकीय और तकनीकी क्षमता दिखाती है.
2) [चेतावनी: आगे रहस्योद्घाटन है] फ़िल्म का अंत भ्रमित करता है. मंज़र अचानक रंगीन हो जाता है, फ़िल्म क्वालिटी विडियो जैसी हो जाती है और क्यारोस्तामी कैमरे और क्रू के साथ नज़र आते हैं. जैसे कह रहे हों कि ये जो आपने देखा वो बस एक फ़िल्म की शूटिंग थी. या ये कि दिख रहे सच के ऊपर एक और सच है?
Sunday, June 17, 2007
शूटर (2007)
Shooter
वाशिंगटन पोस्ट के पुलित्ज़र विजेता फ़िल्मालोचक स्टीवन हंटर के उपन्यास पर आधारित. पूर्वसैनिक, कुशल निशानेबाज़ बॉब ली स्वैगर उनके उपन्यासों का नायक है. अभी तक इस नायक के साथ वे तीन उपन्यास लिख चुके हैं और यह फ़िल्म पहले उपन्यास पर आधारित है. यानि यह एक नयी रैम्बो-नुमा शृंखला की शुरुआत हो सकती है. फ़िल्म चुस्त और तेज़ है. मार्क वॉलबर्ग बॉब ली स्वैगर की भूमिका में जँचते हैं. पर कुल मिलाकर कहानी और पटकथा आम हॉलीवुडी महानायकीय फ़िल्मों के फ़ॉर्मूले से बँधे हैं. मज़ेदार पर साधारण.
वाशिंगटन पोस्ट के पुलित्ज़र विजेता फ़िल्मालोचक स्टीवन हंटर के उपन्यास पर आधारित. पूर्वसैनिक, कुशल निशानेबाज़ बॉब ली स्वैगर उनके उपन्यासों का नायक है. अभी तक इस नायक के साथ वे तीन उपन्यास लिख चुके हैं और यह फ़िल्म पहले उपन्यास पर आधारित है. यानि यह एक नयी रैम्बो-नुमा शृंखला की शुरुआत हो सकती है. फ़िल्म चुस्त और तेज़ है. मार्क वॉलबर्ग बॉब ली स्वैगर की भूमिका में जँचते हैं. पर कुल मिलाकर कहानी और पटकथा आम हॉलीवुडी महानायकीय फ़िल्मों के फ़ॉर्मूले से बँधे हैं. मज़ेदार पर साधारण.
Monday, May 14, 2007
द नेमसेक | The Namesake (2007)
अमेरिकी आप्रवासियों और उनकी समस्याओं को फ़िल्म कई सतहों पर छूती है. पर सतह से आगे नहीं बढ़ पाती. फ़िल्म के कथानक (सूनी तारापोरवाला) में और गहरे जाने का अवकाश था. इसके बावजूद फ़िल्म रोचक है और गुदगुदाते संवादों से ध्यान खींचे रखती है. किताब (झुम्पा लाहिड़ी लिखित) के मूल कथ्य के साथ भी न्याय करती है.
मीरा नायर (निर्देशक) अंग्रेज़ी दर्शकों के भारत संबंधी पूर्वाग्रहों को भुनाती ही दिखती हैं. चाहे वे कलकत्ता की सड़कों के सीन हों या ताजमहल के दृश्य, कैमरा (फ़्रेड्रिक एम्स) इन्हें टूरिस्टी नज़रिये से निहारता लगता है. पर कुछ दृश्य संवेदनशीलता और प्रभावी तरीके से फ़िल्माए गए हैं.
तकनीकी और तथ्यात्मक ग़लतियाँ कई हैं. जैसे न्यू यॉर्क से कलकत्ता की उड़ान के लिए एयर इंडिया की जगह इंडियन एयरलाइंस (जोकि भारत की घरेलू एयर सेवा है) का जहाज दिखाना. 1977 के कलकत्ता में द टेलीग्राफ़ का बोर्ड (बड़ी प्रमुखता से) दिखता है, जो 1982 में शुरू हुआ था. ग़लतियाँ इतनी स्पष्ट हैं कि फ़िल्म देखते वक़्त ही खटकती हैं.
अभिनेताओं में तब्बू कमाल है. इरफ़ान ख़ान ने भी, जैसी उनसे अपेक्षा थी, अच्छा काम किया है. उम्मीद से उलट, कैल पेन कई जगह अतिशयता के शिकार हुए हैं. एक जगह तो (जहाँ रेल्वे स्टेशन पर वे अपनी पत्नी पर गुस्सा होते हैं) वे ऐंग्री-यंग-अमिताभ के हैंगओवर में लगते हैं.
छुट-पुट:
1) नाम-क्रम के प्रदर्शन में बाँग्ला व रोमन अक्षरों का मेल मोहक है.
2) झुम्पा लाहिड़ी ख़ुद भी कुछ देर के लिए झुम्पा मासी के तौर पर दिखती हैं.
3) फ़िल्म की भाषा पारस्थितिक है. मुख्यतया अंग्रेज़ी, पर कई अवसरों पर बाँग्ला. एकाध डायलॉग हिंदी में भी हैं.
4) फ़िल्म के एक सीन में ये मेरा दीवानापन है (यहूदी) का एक हास्यास्पद रीमिक्स संस्करण बजता है. सीन दिलचस्प है.
IMDB कड़ी
मीरा नायर (निर्देशक) अंग्रेज़ी दर्शकों के भारत संबंधी पूर्वाग्रहों को भुनाती ही दिखती हैं. चाहे वे कलकत्ता की सड़कों के सीन हों या ताजमहल के दृश्य, कैमरा (फ़्रेड्रिक एम्स) इन्हें टूरिस्टी नज़रिये से निहारता लगता है. पर कुछ दृश्य संवेदनशीलता और प्रभावी तरीके से फ़िल्माए गए हैं.
तकनीकी और तथ्यात्मक ग़लतियाँ कई हैं. जैसे न्यू यॉर्क से कलकत्ता की उड़ान के लिए एयर इंडिया की जगह इंडियन एयरलाइंस (जोकि भारत की घरेलू एयर सेवा है) का जहाज दिखाना. 1977 के कलकत्ता में द टेलीग्राफ़ का बोर्ड (बड़ी प्रमुखता से) दिखता है, जो 1982 में शुरू हुआ था. ग़लतियाँ इतनी स्पष्ट हैं कि फ़िल्म देखते वक़्त ही खटकती हैं.
अभिनेताओं में तब्बू कमाल है. इरफ़ान ख़ान ने भी, जैसी उनसे अपेक्षा थी, अच्छा काम किया है. उम्मीद से उलट, कैल पेन कई जगह अतिशयता के शिकार हुए हैं. एक जगह तो (जहाँ रेल्वे स्टेशन पर वे अपनी पत्नी पर गुस्सा होते हैं) वे ऐंग्री-यंग-अमिताभ के हैंगओवर में लगते हैं.
छुट-पुट:
1) नाम-क्रम के प्रदर्शन में बाँग्ला व रोमन अक्षरों का मेल मोहक है.
2) झुम्पा लाहिड़ी ख़ुद भी कुछ देर के लिए झुम्पा मासी के तौर पर दिखती हैं.
3) फ़िल्म की भाषा पारस्थितिक है. मुख्यतया अंग्रेज़ी, पर कई अवसरों पर बाँग्ला. एकाध डायलॉग हिंदी में भी हैं.
4) फ़िल्म के एक सीन में ये मेरा दीवानापन है (यहूदी) का एक हास्यास्पद रीमिक्स संस्करण बजता है. सीन दिलचस्प है.
IMDB कड़ी
Friday, May 11, 2007
भेजा फ्राय (2007)
फ़िल्म इस बात की मिसाल है कि एक अच्छा अभिनेता और एक अच्छी परफ़ॉर्मेंस किसी औसत, बल्कि घटिया, फ़िल्म को भी मनोरंजक बना सकते हैं. विनय पाठक अभी तक की श्रेष्ठतम कॉमिक अदायगियों में से एक के साथ अकेले दम पर फ़िल्म को देखने लायक बनाते हैं. सिर्फ़ देखने लायक ही नहीं, ठहाकों से भरपूर.
लगभग बिना कहानी वाली यह फ़िल्म एक शाम की घटना पर आधारित है. फ़्रांसीसी फ़िल्म 'द डिनर गेम' (अंग्रेज़ी शीर्षक) से उड़ाया गया प्लॉट भारतीय संदर्भों में नहीं जँचता और पटकथा में अविश्वसनीयता का भाव लाता है.
बाक़ी ऐक्टरों में रजत कपूर हमेशा की तरह संतुलित हैं. रणवीर शूरी छोटे से रोल में हैं और थोऽऽड़ा ओवर-द-टॉप हुए हैं. मिलिंद सोमन इतने बुरे ऐक्टर हैं ये मुझे पता नहीं था. सारिका ठीक हैं, कम से कम आज के कमल हासन से बेहतर. काफ़ी दिनों बाद उन्हें पर्दे पर देखकर अच्छा लगा.
विनय पाठक के लिए देखने वाली फ़िल्म. पुराने हिंदी गानों के शौकीनों को और मज़ा आयेगा.
लगभग बिना कहानी वाली यह फ़िल्म एक शाम की घटना पर आधारित है. फ़्रांसीसी फ़िल्म 'द डिनर गेम' (अंग्रेज़ी शीर्षक) से उड़ाया गया प्लॉट भारतीय संदर्भों में नहीं जँचता और पटकथा में अविश्वसनीयता का भाव लाता है.
बाक़ी ऐक्टरों में रजत कपूर हमेशा की तरह संतुलित हैं. रणवीर शूरी छोटे से रोल में हैं और थोऽऽड़ा ओवर-द-टॉप हुए हैं. मिलिंद सोमन इतने बुरे ऐक्टर हैं ये मुझे पता नहीं था. सारिका ठीक हैं, कम से कम आज के कमल हासन से बेहतर. काफ़ी दिनों बाद उन्हें पर्दे पर देखकर अच्छा लगा.
विनय पाठक के लिए देखने वाली फ़िल्म. पुराने हिंदी गानों के शौकीनों को और मज़ा आयेगा.
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