Showing posts with label हिंदी. Show all posts
Showing posts with label हिंदी. Show all posts
Sunday, June 10, 2007
शूटआउट एट लोखंडवाला (2007)
फ़िल्म की शुरुआत में ही चेतावनी मिल गई थी - "सच्ची अफ़वाहों पर आधारित". न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम. गानों को फास्ट-फारवर्ड करने के बावजूद फ़िल्म धीरज का इम्तिहान लेती है. बचिए.
Monday, June 04, 2007
लाइफ़ इन ए मेट्रो (2007)
माना कि 60 के अमेरिका जैसा क्यूबिकल-संसार अब भारत में भी पसर रहा है. पर इसका मतलब यह तो नहीं कि फ़िल्मों के प्लॉट भी वहीं से उधारी लिए जाएँ. और उधारी भी कहाँ, चोरी, बल्कि चोरी भी क्या, डकैती! ऑरिजिनल चिंतन नाम की चीज़ मुम्बई में बची है कि नहीं?
फ़िल्म की प्रस्तावना ('प्रेमिस') ही दुरुस्त नहीं, बाक़ी का क्या कहिये. वही भेजा फ़्राय वाला हिसाब. 1960 की अमेरिकी फ़िल्म द अपार्टमेंट, जो कि एक निहायत मज़ेदार और ईमानदार फ़िल्म थी, का प्लॉट यूँ का यूँ मुम्बई में चिपका दिया है अनुराग बसु ने. भाई मेरे, महज भाषा बदलने से कल्चर अनुवादित नहीं होता.
ऊपर से निर्देशकीय नौसिखियेपन के उदाहरण बिखरे पड़े हैं फ़िल्म में. मिसाल देखिये (चेतावनी - आगे रहस्योदघाटन है). कोंकणा को उसका बॉस जब पहली बार ऑफ़िस (या जिम?) में बुलाता है तो फ़्रेम में उसके पीछे ब्रोकबैक माउण्टेन का पोस्टर लगा दिखता है. अब लीजिए. जो रहस्य फ़िल्म में 15 मिनट बाद इन्हें सनसनीखेज़ तरीके से खोलना है, उसकी वे यहीं बत्ती लगा देते हैं. (चेतावनी समाप्त) अनुराग बाबू, समझदार निर्देशक ऐसे चोंचले नहीं करता, फ़िल्म की क़ीमत पर तो कतई नहीं.
और एक ये प्रीतम एण्ड कंपनी. हर 20 मिनट में किसी चौराहे पर अपने बैंड के साथ गिटार लेकर आ जाते हैं. नहीं, 2-3 बार ठीक लगता है (ख़ासकर 'इन दिनों' सुनने में भला लगता है) पर फिर झुंझलाहट होने लगती है. अच्छे निर्देशक की एक ख़ूबी ये होती है कि उसे पता होता है कि कहाँ रुकना है.
पर एक बात अच्छी लगी अनुराग की. हालाँकि कुछ देर तक वो यथार्थ का नाटक ज़रूर करते हैं, क्लाइमैक्स तक आते-आते जब उनकी पोल-पट्टी खुलने लगती है, बड़ी ईमानदारी से मान जाते हैं कि भई मैं तो मज़ाक़ कर रहा था. कहाँ का सच, कौन सा यथार्थ. छोड़ो यार .. मुझे इरफ़ान को घोड़े पर शहर में भगाने दो.
नहीं नहीं ग़लत मत समझें. फ़िल्म बुरी नहीं है. अच्छा टाइम-पास है. इरफ़ान और कोंकणा फ़िल्म को देखने लायक बनाते हैं. इनकी अदाकारी में इम्प्रोवाइज़ेशन का अच्छा खासा पुट दिखता है. कोंकणा निश्चय ही अपने वक़्त की बेहतरीन अभिनेत्रियों में से हैं. तो अगर आम मसाला फ़िल्मों से कोई ख़ास आपत्ति न हो तो फ़िल्म आराम से देखिये. बुरी नहीं है. पर ऐसा अनुराग बसु की वजह से नहीं है, उनके बावजूद है.
मेरी कई बातों को कहीं बेहतर तरीके से समझाया है सिलेमा वाले साब जी ने. उनसे बस इतना ही कहना है कि फ़िल्म इस लायक नहीं कि इस पर कोई गंभीर बहस हो. इसलिए चाय खत्म कीजिए, आगे चलते हैं.
फ़िल्म की प्रस्तावना ('प्रेमिस') ही दुरुस्त नहीं, बाक़ी का क्या कहिये. वही भेजा फ़्राय वाला हिसाब. 1960 की अमेरिकी फ़िल्म द अपार्टमेंट, जो कि एक निहायत मज़ेदार और ईमानदार फ़िल्म थी, का प्लॉट यूँ का यूँ मुम्बई में चिपका दिया है अनुराग बसु ने. भाई मेरे, महज भाषा बदलने से कल्चर अनुवादित नहीं होता.
ऊपर से निर्देशकीय नौसिखियेपन के उदाहरण बिखरे पड़े हैं फ़िल्म में. मिसाल देखिये (चेतावनी - आगे रहस्योदघाटन है). कोंकणा को उसका बॉस जब पहली बार ऑफ़िस (या जिम?) में बुलाता है तो फ़्रेम में उसके पीछे ब्रोकबैक माउण्टेन का पोस्टर लगा दिखता है. अब लीजिए. जो रहस्य फ़िल्म में 15 मिनट बाद इन्हें सनसनीखेज़ तरीके से खोलना है, उसकी वे यहीं बत्ती लगा देते हैं. (चेतावनी समाप्त) अनुराग बाबू, समझदार निर्देशक ऐसे चोंचले नहीं करता, फ़िल्म की क़ीमत पर तो कतई नहीं.
और एक ये प्रीतम एण्ड कंपनी. हर 20 मिनट में किसी चौराहे पर अपने बैंड के साथ गिटार लेकर आ जाते हैं. नहीं, 2-3 बार ठीक लगता है (ख़ासकर 'इन दिनों' सुनने में भला लगता है) पर फिर झुंझलाहट होने लगती है. अच्छे निर्देशक की एक ख़ूबी ये होती है कि उसे पता होता है कि कहाँ रुकना है.
पर एक बात अच्छी लगी अनुराग की. हालाँकि कुछ देर तक वो यथार्थ का नाटक ज़रूर करते हैं, क्लाइमैक्स तक आते-आते जब उनकी पोल-पट्टी खुलने लगती है, बड़ी ईमानदारी से मान जाते हैं कि भई मैं तो मज़ाक़ कर रहा था. कहाँ का सच, कौन सा यथार्थ. छोड़ो यार .. मुझे इरफ़ान को घोड़े पर शहर में भगाने दो.
नहीं नहीं ग़लत मत समझें. फ़िल्म बुरी नहीं है. अच्छा टाइम-पास है. इरफ़ान और कोंकणा फ़िल्म को देखने लायक बनाते हैं. इनकी अदाकारी में इम्प्रोवाइज़ेशन का अच्छा खासा पुट दिखता है. कोंकणा निश्चय ही अपने वक़्त की बेहतरीन अभिनेत्रियों में से हैं. तो अगर आम मसाला फ़िल्मों से कोई ख़ास आपत्ति न हो तो फ़िल्म आराम से देखिये. बुरी नहीं है. पर ऐसा अनुराग बसु की वजह से नहीं है, उनके बावजूद है.
मेरी कई बातों को कहीं बेहतर तरीके से समझाया है सिलेमा वाले साब जी ने. उनसे बस इतना ही कहना है कि फ़िल्म इस लायक नहीं कि इस पर कोई गंभीर बहस हो. इसलिए चाय खत्म कीजिए, आगे चलते हैं.
Friday, May 11, 2007
भेजा फ्राय (2007)
फ़िल्म इस बात की मिसाल है कि एक अच्छा अभिनेता और एक अच्छी परफ़ॉर्मेंस किसी औसत, बल्कि घटिया, फ़िल्म को भी मनोरंजक बना सकते हैं. विनय पाठक अभी तक की श्रेष्ठतम कॉमिक अदायगियों में से एक के साथ अकेले दम पर फ़िल्म को देखने लायक बनाते हैं. सिर्फ़ देखने लायक ही नहीं, ठहाकों से भरपूर.
लगभग बिना कहानी वाली यह फ़िल्म एक शाम की घटना पर आधारित है. फ़्रांसीसी फ़िल्म 'द डिनर गेम' (अंग्रेज़ी शीर्षक) से उड़ाया गया प्लॉट भारतीय संदर्भों में नहीं जँचता और पटकथा में अविश्वसनीयता का भाव लाता है.
बाक़ी ऐक्टरों में रजत कपूर हमेशा की तरह संतुलित हैं. रणवीर शूरी छोटे से रोल में हैं और थोऽऽड़ा ओवर-द-टॉप हुए हैं. मिलिंद सोमन इतने बुरे ऐक्टर हैं ये मुझे पता नहीं था. सारिका ठीक हैं, कम से कम आज के कमल हासन से बेहतर. काफ़ी दिनों बाद उन्हें पर्दे पर देखकर अच्छा लगा.
विनय पाठक के लिए देखने वाली फ़िल्म. पुराने हिंदी गानों के शौकीनों को और मज़ा आयेगा.
लगभग बिना कहानी वाली यह फ़िल्म एक शाम की घटना पर आधारित है. फ़्रांसीसी फ़िल्म 'द डिनर गेम' (अंग्रेज़ी शीर्षक) से उड़ाया गया प्लॉट भारतीय संदर्भों में नहीं जँचता और पटकथा में अविश्वसनीयता का भाव लाता है.
बाक़ी ऐक्टरों में रजत कपूर हमेशा की तरह संतुलित हैं. रणवीर शूरी छोटे से रोल में हैं और थोऽऽड़ा ओवर-द-टॉप हुए हैं. मिलिंद सोमन इतने बुरे ऐक्टर हैं ये मुझे पता नहीं था. सारिका ठीक हैं, कम से कम आज के कमल हासन से बेहतर. काफ़ी दिनों बाद उन्हें पर्दे पर देखकर अच्छा लगा.
विनय पाठक के लिए देखने वाली फ़िल्म. पुराने हिंदी गानों के शौकीनों को और मज़ा आयेगा.
Tuesday, September 19, 2006
१०० आवश्यक फ़िल्में
उर्फ़
१०० फ़िल्में जिन्हें देखे बिना हिंदी सिनेमा पर सार्थक बहस नहीं की जा सकती(जिम एमर्सन की अँगरेज़ी सूची से प्रेरित)
यह महान फ़िल्मों की सूची नहीं है, हालाँकि इसकी अधिकतर फ़िल्में ऐसी किसी सूची में भी हो सकती हैं. ये वे फ़िल्में हैं जो हमारी साझा सिनेमाई विरासत का हिस्सा हैं. जिनके बारे में यह समझा जा सकता है कि इन्हें एक प्रबुद्ध सिनेमा दर्शक ने देखा होगा.
इस सूची में सिर्फ़ स्वातंत्र्योत्तर प्रदर्शित फ़िल्में शामिल हैं, क्योंकि उससे पहले की फ़िल्मों को दायरे में लेना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल होता. कारण उस दौर से अनभिज्ञता तो है ही, यह भी है कि उस दौर की फ़िल्में अब आसानी से उपलब्ध नहीं हो पातीं. इसके अलावा और कई कारणों से भी, जिसमें कई कलाकारों का पाकिस्तान चले जाना शामिल है, वर्ष १९४७ हिंदी सिनेमा में एक विभाजक वर्ष है. इतना ज़रूर कहना चाहूँगा कि अगर १९४७-पूर्व की फ़िल्में भी इसमें जुड़तीं तो मैं ये कुछ फ़िल्में पहले जोड़ता: अछूत कन्या, क़िस्मत, डॉ कोटनीस की अमर कहानी, पुकार, सिकंदर.
मेरी कोशिश रही है कि महत्त्वपूर्ण विधाओं, मुद्दों, निर्देशकों, अभिनेताओं, प्रयोगों और हर काल को उचित प्रतिनिधित्व मिले. साथ ही मैंने यह भी ध्यान रखने की कोशिश की है कि चयनित फ़िल्में व्यापक तौर पर मौलिक हों.
ज़ाहिर है कि मेरी सूची है तो इसमें मेरी पसंद की फ़िल्में होंगी. पर मैं ज़रूर जानना चाहूँगा कि ऐसी कौन-सी फ़िल्में हैं जो आप इस सूची में जोड़ते, और किन फ़िल्मों को हटाकर.
1974 अंकुर - श्याम बेनेगल
1982 अंगूर - गुलज़ार
1949 अंदाज़ - महबूब ख़ान
1994 अन्दाज़ अपना अपना - राजकुमार संतोषी
1966 अनुपमा - ऋषिकेश मुकर्जी
1960 अनुराधा - ऋषिकेश मुकर्जी
1973 अभिमान - ऋषिकेश मुकर्जी
1977 अमर अकबर एंथोनी - मनमोहन देसाई
1985 अर्जुन - राहुल रवैल
1982 अर्थ - महेश भट्ट
1983 अर्ध सत्य - गोविंद निहलानी
1980 आक्रोश - गोविंद निहलानी
1975 आँधी - गुलज़ार
1970 आनन्द - ऋषिकेश मुकर्जी
1951 आवारा - राज कपूर
1987 इजाज़त - गुलज़ार
1996 इस रात की सुबह नहीं - सुधीर मिश्रा
1989 एक दिन अचानक - मृणाल सेन
1983 कथा - सई परांजपे
1976 कभी-कभी - यश चोपड़ा
1988 क़यामत से क़यामत तक - मंसूर ख़ान
1959 कागज़ के फूल - गुरू दत्त
1960 क़ानून - बी आर चोपड़ा
1972 कोशिश - गुलज़ार
1999 कौन - रामगोपाल वर्मा
1980 ख़ूबसूरत - ऋषिकेश मुकर्जी
1985 ख़ामोश - विधु विनोद चोपड़ा
1961 गंगा जमुना - नितिन बोस
1973 गरम हवा - एम एस सथ्यू
1965 गाइड - विजय आनंद
1979 गोलमाल - ऋषिकेश मुकर्जी
1975 चुपके चुपके - ऋषिकेश मुकर्जी
1958 चलती का नाम गाड़ी - सत्येन बोस
1981 चश्म-ए-बद्दूर - सई परांजपे
2001 चाँदनी बार - मधुर भंडारकर
1976 चितचोर - बासु चटर्जी
1979 जुनून - श्याम बेनेगल
1967 ज्वेल थीफ़ - विजय आनंद
1959 जागते रहो - अमित-शंभु मित्रा
1954 जाग्रति - सत्येन बोस
1983 जाने भी दो यारो - कुंदन शाह
1950 जोगन - केदार शर्मा
1963 तेरे घर के सामने - विजय आनंद
1966 तीसरी कसम - बासु भट्टाचार्य
1966 तीसरी मंज़िल - विजय आनंद
1990 थोड़ा सा रुमानी हो जाएँ - अमोल पालेकर
1955 देवदास - बिमल राय
2001 दिल चाहता है - फ़रहान अख़्तर
1975 दीवार - यश चोपड़ा
1957 दो आँखें बारह हाथ - वी शांताराम
1953 दो बीघा ज़मीन - बिमल राय
1982 नमकीन - गुलज़ार
1957 नया दौर - बी आर चोपड़ा
1968 पड़ोसन - ज्योति स्वरूप
1957 प्यासा - गुरू दत्त
1982 प्रेम रोग - राज कपूर
1989 परिंदा - विधु विनोद चोपड़ा
1988 पुष्पक - संगीतम श्रीनिवास राव
1958 फिर सुबह होगी - रमेश सहगल
1994 बैंडिट क्वीन - शेखर कपूर
1963 बन्दिनी - बिमल राय
1967 बहू बेग़म - एम सादिक़
1979 बातों बातों में - बासु चटर्जी
1972 बावर्ची - ऋषिकेश मुकर्जी
1969 भुवन शोम - मृणाल सेन
1978 मुकद्दर का सिकंदर - प्रकाश मेहरा
2003 मक़बूल - विशाल
1960 मुग़ल-ए-आज़म - के आसिफ़
1983 मंडी - श्याम बेनेगल
1957 मदर इंडिया - महबूब ख़ान
1958 मधुमती - बिमल राय
1994 मम्मो - श्याम बेनेगल
1966 मेरा साया - राज खोसला
1949 महल - कमाल अमरोही
1983 मासूम - शेखर कपूर
1985 मिर्च मसाला - केतन मेहता
1987 मिस्टर इण्डिया - शेखर कपूर
2005 रँग दे बसंती - ओम प्रकाश मेहरा
1990 लेकिन - गुलज़ार
2001 लगान - आशुतोष गोवारिकर
1991 लम्हे - यश चोपड़ा
1965 वक़्त - यश चोपड़ा
1999 वास्तव - महेश मंजरेकर
1982 विजेता - गोविंद निहलानी
1983 वो सात दिन - बापू
1982 शक्ति - रमेश सिप्पी
1977 शतरंज के खिलाड़ी - सत्यजीत राय
1973 शोले - रमेश सिप्पी
1959 सुजाता - बिमल राय
1969 सत्यकाम - ऋषिकेश मुकर्जी
1998 सत्या - रामगोपाल वर्मा
1983 सदमा - बालू महेंद्र
2004 स्वदेस - आशुतोष गोवारिकर
1985 सागर - रमेश सिप्पी
1984 सारांश - महेश भट्ट
1962 साहिब, बीवी, और ग़ुलाम - अबरार अल्वी
1981 सिलसिला - यश चोपड़ा
1964 हक़ीक़त - चेतन आनंद
1994 हम आपके हैं कौन - सूरज बड़जात्या
1962 हाफ़ टिकट - कालिदास
१०० फ़िल्में जिन्हें देखे बिना हिंदी सिनेमा पर सार्थक बहस नहीं की जा सकती(जिम एमर्सन की अँगरेज़ी सूची से प्रेरित)
यह महान फ़िल्मों की सूची नहीं है, हालाँकि इसकी अधिकतर फ़िल्में ऐसी किसी सूची में भी हो सकती हैं. ये वे फ़िल्में हैं जो हमारी साझा सिनेमाई विरासत का हिस्सा हैं. जिनके बारे में यह समझा जा सकता है कि इन्हें एक प्रबुद्ध सिनेमा दर्शक ने देखा होगा.
इस सूची में सिर्फ़ स्वातंत्र्योत्तर प्रदर्शित फ़िल्में शामिल हैं, क्योंकि उससे पहले की फ़िल्मों को दायरे में लेना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल होता. कारण उस दौर से अनभिज्ञता तो है ही, यह भी है कि उस दौर की फ़िल्में अब आसानी से उपलब्ध नहीं हो पातीं. इसके अलावा और कई कारणों से भी, जिसमें कई कलाकारों का पाकिस्तान चले जाना शामिल है, वर्ष १९४७ हिंदी सिनेमा में एक विभाजक वर्ष है. इतना ज़रूर कहना चाहूँगा कि अगर १९४७-पूर्व की फ़िल्में भी इसमें जुड़तीं तो मैं ये कुछ फ़िल्में पहले जोड़ता: अछूत कन्या, क़िस्मत, डॉ कोटनीस की अमर कहानी, पुकार, सिकंदर.
मेरी कोशिश रही है कि महत्त्वपूर्ण विधाओं, मुद्दों, निर्देशकों, अभिनेताओं, प्रयोगों और हर काल को उचित प्रतिनिधित्व मिले. साथ ही मैंने यह भी ध्यान रखने की कोशिश की है कि चयनित फ़िल्में व्यापक तौर पर मौलिक हों.
ज़ाहिर है कि मेरी सूची है तो इसमें मेरी पसंद की फ़िल्में होंगी. पर मैं ज़रूर जानना चाहूँगा कि ऐसी कौन-सी फ़िल्में हैं जो आप इस सूची में जोड़ते, और किन फ़िल्मों को हटाकर.
1974 अंकुर - श्याम बेनेगल
1982 अंगूर - गुलज़ार
1949 अंदाज़ - महबूब ख़ान
1994 अन्दाज़ अपना अपना - राजकुमार संतोषी
1966 अनुपमा - ऋषिकेश मुकर्जी
1960 अनुराधा - ऋषिकेश मुकर्जी
1973 अभिमान - ऋषिकेश मुकर्जी
1977 अमर अकबर एंथोनी - मनमोहन देसाई
1985 अर्जुन - राहुल रवैल
1982 अर्थ - महेश भट्ट
1983 अर्ध सत्य - गोविंद निहलानी
1980 आक्रोश - गोविंद निहलानी
1975 आँधी - गुलज़ार
1970 आनन्द - ऋषिकेश मुकर्जी
1951 आवारा - राज कपूर
1987 इजाज़त - गुलज़ार
1996 इस रात की सुबह नहीं - सुधीर मिश्रा
1989 एक दिन अचानक - मृणाल सेन
1983 कथा - सई परांजपे
1976 कभी-कभी - यश चोपड़ा
1988 क़यामत से क़यामत तक - मंसूर ख़ान
1959 कागज़ के फूल - गुरू दत्त
1960 क़ानून - बी आर चोपड़ा
1972 कोशिश - गुलज़ार
1999 कौन - रामगोपाल वर्मा
1980 ख़ूबसूरत - ऋषिकेश मुकर्जी
1985 ख़ामोश - विधु विनोद चोपड़ा
1961 गंगा जमुना - नितिन बोस
1973 गरम हवा - एम एस सथ्यू
1965 गाइड - विजय आनंद
1979 गोलमाल - ऋषिकेश मुकर्जी
1975 चुपके चुपके - ऋषिकेश मुकर्जी
1958 चलती का नाम गाड़ी - सत्येन बोस
1981 चश्म-ए-बद्दूर - सई परांजपे
2001 चाँदनी बार - मधुर भंडारकर
1976 चितचोर - बासु चटर्जी
1979 जुनून - श्याम बेनेगल
1967 ज्वेल थीफ़ - विजय आनंद
1959 जागते रहो - अमित-शंभु मित्रा
1954 जाग्रति - सत्येन बोस
1983 जाने भी दो यारो - कुंदन शाह
1950 जोगन - केदार शर्मा
1963 तेरे घर के सामने - विजय आनंद
1966 तीसरी कसम - बासु भट्टाचार्य
1966 तीसरी मंज़िल - विजय आनंद
1990 थोड़ा सा रुमानी हो जाएँ - अमोल पालेकर
1955 देवदास - बिमल राय
2001 दिल चाहता है - फ़रहान अख़्तर
1975 दीवार - यश चोपड़ा
1957 दो आँखें बारह हाथ - वी शांताराम
1953 दो बीघा ज़मीन - बिमल राय
1982 नमकीन - गुलज़ार
1957 नया दौर - बी आर चोपड़ा
1968 पड़ोसन - ज्योति स्वरूप
1957 प्यासा - गुरू दत्त
1982 प्रेम रोग - राज कपूर
1989 परिंदा - विधु विनोद चोपड़ा
1988 पुष्पक - संगीतम श्रीनिवास राव
1958 फिर सुबह होगी - रमेश सहगल
1994 बैंडिट क्वीन - शेखर कपूर
1963 बन्दिनी - बिमल राय
1967 बहू बेग़म - एम सादिक़
1979 बातों बातों में - बासु चटर्जी
1972 बावर्ची - ऋषिकेश मुकर्जी
1969 भुवन शोम - मृणाल सेन
1978 मुकद्दर का सिकंदर - प्रकाश मेहरा
2003 मक़बूल - विशाल
1960 मुग़ल-ए-आज़म - के आसिफ़
1983 मंडी - श्याम बेनेगल
1957 मदर इंडिया - महबूब ख़ान
1958 मधुमती - बिमल राय
1994 मम्मो - श्याम बेनेगल
1966 मेरा साया - राज खोसला
1949 महल - कमाल अमरोही
1983 मासूम - शेखर कपूर
1985 मिर्च मसाला - केतन मेहता
1987 मिस्टर इण्डिया - शेखर कपूर
2005 रँग दे बसंती - ओम प्रकाश मेहरा
1990 लेकिन - गुलज़ार
2001 लगान - आशुतोष गोवारिकर
1991 लम्हे - यश चोपड़ा
1965 वक़्त - यश चोपड़ा
1999 वास्तव - महेश मंजरेकर
1982 विजेता - गोविंद निहलानी
1983 वो सात दिन - बापू
1982 शक्ति - रमेश सिप्पी
1977 शतरंज के खिलाड़ी - सत्यजीत राय
1973 शोले - रमेश सिप्पी
1959 सुजाता - बिमल राय
1969 सत्यकाम - ऋषिकेश मुकर्जी
1998 सत्या - रामगोपाल वर्मा
1983 सदमा - बालू महेंद्र
2004 स्वदेस - आशुतोष गोवारिकर
1985 सागर - रमेश सिप्पी
1984 सारांश - महेश भट्ट
1962 साहिब, बीवी, और ग़ुलाम - अबरार अल्वी
1981 सिलसिला - यश चोपड़ा
1964 हक़ीक़त - चेतन आनंद
1994 हम आपके हैं कौन - सूरज बड़जात्या
1962 हाफ़ टिकट - कालिदास
Wednesday, May 11, 2005
स्वदेस - दूसरे दौर की समीक्षा
कल दुबारा 'स्वदेस' देखी। इससे पहले एक लम्बे अर्से में मुझे ऐसी कोई फ़िल्म याद नहीं आती, जो छह महीने के अन्तराल में दो बार साढ़े तीन घंटे तक मुझे बिठा के रख सकी हो। और यह तब है जबकि शाहरुख खान का नाम सुनते ही मुझे छींकें शुरू हो जाती हैं।
फ़िल्म की सबसे खास बात मुझे इसका असलीपन लगा। पात्रों, घटनाओं, मुद्दों से लेकर गलियों, घरों, भाषा और लहजे तक सब बहुत वास्तविक और सच्चे लगते हैं। और फिर भी कहानी का जो अपना 'larger-than-life'वाला व्यक्तित्व होता है वह भी बरकरार रहता है। कुल मिला कर, यह बहुत ही सलीके से सुनाई गई कहानी है जिसमें उम्दा विषय-वस्तु, श्रेष्ठ निर्माण मूल्यों, और सिनेमाई गुणवत्ता के चलते महान होने के पूरे गुण मौजूद हैं। मुझे इस फ़िल्म को आज तक की सभी हिन्दी फ़िल्मों में से कुछ चुनिंदा "न छोड़ने योग्य" फ़िल्मों की सूची में रखने में कोई हिचक नहीं होगी।
आशुतोष गोवारिकर अपनी पीढ़ी के महान निर्देशकों में नाम लिखाने की ओर अग्रसर हैं। 'लगान' शायद ज़्यादा मनोरंजक फ़िल्म थी, पर 'स्वदेस' अधिक विचारोत्तेजक और गहन है। गम्भीर, सामयिक और मुद्दों पर आधारित सिनेमा है। अपने समय की 'दो बीघा ज़मीन' है। पर इनकी ये दोनों फ़िल्में सिनेमाई उत्कृष्टता और अच्छी कही कहानी का श्रेष्ठ उदाहरण हैं। उनकी निर्देशकीय प्रतिभा अब तुक्के की बात नहीं रही। उन्होंने इसे सिद्ध कर दिया है। स्वदेस से ही एक विशेष उदाहरण लें। फ़िल्म में जब मोहन भार्गव (शाहरुख) हरिदास के गाँव से बिना किराया वसूले वापस लौटता है तो पहले नाव पर और फिर ट्रेन में उन दृश्यों में बिना कुछ कहे वे बहुत कुछ कह गए हैं। दृश्य के अन्त में जब मोहन पानी खरीद कर पीता है, वह मेरी हाल की याददाश्त में सबसे प्रभावी दृश्यों में से है। कहते हैं समझदार को इशारा काफ़ी होता है। अधिकतर हिंदी फ़िल्मकार या तो हमें समझदार नहीं समझते या उन्हें इशारा करना नहीं आता। शुक्र है कि इस फ़िल्मे में इस 'इशारे' की वापसी के संकेत दिखते हैं।
गायत्री जोशी बेहद प्रभावित करती हैं। जहाँ उन्हें नए चेहरे का फ़ायदा मिला है वहीं अभिनय में परिपक्वता भी दिखती है। पर उनका रोना-धोना थोड़ा कमज़ोर है। शाहरुख बिना किसी हिचक के इस फ़िल्म को अपनी सर्वश्रेष्ठ भूमिका और सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करार दे सकते हैं। वैसे सर्वश्रेष्ठ की बजाय एकमात्र श्रेष्ठ कहना भी कुछ गलत नहीं होगा। अभिनय के अलावा एक और चीज जो इस फ़िल्म को सफल बनाती है वह है इसकी पटकथा और उससे भी ज़्यादा इसके संवाद। पात्र बड़े स्वाभाविक लगते हैं। सब वही भाषा बोल रहे हैं जो करोड़ों लोग रोज शहरों, कस्बों और गाँवों में आम बोलचाल में बोलते हैं। संवाद की शक्ति इस फ़िल्म में उभर कर आती है। मेरा मानना है कि किसी कहानी या फ़िल्म के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है किरदारों को विश्वसनीय बनाना। और संवाद, उनकी बोली और लहजा वो जादू की छड़ी है जो अगर ठीक से चलाई जाए तो हाथों-हाथ देखने वाले को पात्रों से जोड़ देती है। के पी सक्सेना ने लगान में भी यह कर दिखाया था और यहाँ भी वे पूरे सफल रहे हैं।
फ़िल्म के गाने मुझे फ़िल्म में बेहतर लगे। शुक्र है कि आशुतोष उन दिग्दर्शकों में से हैं जिन्हें गाने की ताकत का अन्दाज़ा है और उससे भी महत्वपूर्ण यह कि वे गाने के माध्यम से अपनी कहानी को आगे बढ़ाना जानते हैं। पिछले काफ़ी अर्से से रहमान की धुनें मुझे कुछ खास रुचिकर नहीं लगीं, पर पार्श्वसंगीत के मामले में मैं उन्हें अभी भी सबसे बेहतर उपलब्ध संगीतकारों में शुमार करता हूँ। इस फ़िल्म का पार्श्वसंगीत भी अपनी पारदर्शिता और भराव की वजह से अच्छा असर छोड़ता है।
पर यह भी सच नहीं कि स्वदेस एक सम्पूर्ण फ़िल्म है। कुल मिलाकर करीब ८-१० मिनट की फ़िल्म ऐसी है जो बाकी फ़िल्म के स्तर से मेल नहीं खाती। मसलन, नासा में फ़िल्माए अधिकतर दृश्य सपाट हैं। निर्देशक अमरीकी अभिनेताओं को अच्छी तरह 'हैंडल' नहीं कर पाए हैं। इसी तरह वृद्धाश्रम का दृश्य बड़ा ही कमज़ोर है, शायद नौसिखिया कलाकारों की वजह से। हालाँकि बाकी फ़िल्म में आशुतोष ने सहायक कलाकारों से कमाल का काम लिया है। एक और दृश्य जो मेरे खयाल में थोड़ा 'कच्चा' रह गया, वह है दशहरे वाले दिन मोहन भार्गव का गाँव के लोगों से "भारत की महानता" के बारे में मतभेद। मुझे लगता है कि यह फ़िल्म के सबसे महत्वपूर्ण दृश्यों में से था और इसे और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता था। पर ऐसे सीन गिने-चुने हैं। तीन घंटे से अधिक के आनन्द में ये कुछ पल खास बाधा नहीं डालते।
मैं जानता हूँ कि लम्बाई की वजह से फ़िल्म की आलोचना हुई है। यहाँ तक कि उनके द्वारा भी जिन्हें फ़िल्म वैसे पसंद आई है। मुझे नहीं लगता कि यह आलोचना जायज़ है। फ़िल्म लंबी ज़रूर चलती है, पर थकती नहीं। उद्देश्य यह नहीं होता कि फ़िल्म लंबी न हो, बल्कि यह होता है कि उबाऊ न हो। स्वदेस बिल्कुल अन्त तक ताजा और रुचिकर रहती है। एकाध क्षण ऐसे आते हैं जब थोड़ी बेचैनी होती है या घड़ी की तरफ़ ध्यान जाता है (जैसे अन्त के आसपास नासा वाला सीन थोड़ा-सा लम्बा खिंच गया है), पर बड़ी जल्दी ही फ़िल्म पटरी पर वापस आ जाती है।
मेरे विचार में गम्भीर फ़िल्मों का निर्माण-मूल्यों से लैस होना हिन्दी फ़िल्मों के लिए एक दुर्लभ संयोग है। और जब ऐसा हो तो यह ख़ुशी का कारण है, और उम्मीद का भी। स्वदेस मेरे खयाल से ऐसी ही घटना है।
अन्त में आशुतोष से एक अनुरोध : भाई मेरे, जो कर रहे हो, जैसे कर रहे हो, वैसे ही करते रहो। कारण कि बिल्कुल सही-सही कर रहे हो। एक बात और। ये 'स्वदेश' नाम में क्या बुराई थी लाला? तत्सम-तद्भव ऐसे 'मिक्स' करने की क्या ज़रूरत आ पड़ी। अगर इतनी ही ठेठ होने की पड़ी थी तो 'अपना देस' कह लेते। 'स्व' संस्कृत का उपसर्ग है, इसे हर हिंदी शब्द के साथ नहीं जोड़ा जाता। यह किसी तत्सम के साथ ही जाता है। कभी 'स्व-गाँव' सुना है? क्या है कि आँख-कान को थोड़ा खटकता है। बाकी तुम्हारी फ़िल्म है, जो मर्जी नाम रखो। नाम का यही तो फ़ायदा है कि उसका कोई अर्थ निकलना ज़रूरी नहीं, न ही सही होना। इसी 'टेक्नीकॅलिटि' के चलते बच गए इस बार। पर इसका और फ़ायदा मत उठाना, भाई।
फ़िल्म की सबसे खास बात मुझे इसका असलीपन लगा। पात्रों, घटनाओं, मुद्दों से लेकर गलियों, घरों, भाषा और लहजे तक सब बहुत वास्तविक और सच्चे लगते हैं। और फिर भी कहानी का जो अपना 'larger-than-life'
आशुतोष गोवारिकर अपनी पीढ़ी के महान निर्देशकों में नाम लिखाने की ओर अग्रसर हैं। 'लगान' शायद ज़्यादा मनोरंजक फ़िल्म थी, पर 'स्वदेस' अधिक विचारोत्तेजक और गहन है। गम्भीर, सामयिक और मुद्दों पर आधारित सिनेमा है। अपने समय की 'दो बीघा ज़मीन' है। पर इनकी ये दोनों फ़िल्में सिनेमाई उत्कृष्टता और अच्छी कही कहानी का श्रेष्ठ उदाहरण हैं। उनकी निर्देशकीय प्रतिभा अब तुक्के की बात नहीं रही। उन्होंने इसे सिद्ध कर दिया है। स्वदेस से ही एक विशेष उदाहरण लें। फ़िल्म में जब मोहन भार्गव (शाहरुख) हरिदास के गाँव से बिना किराया वसूले वापस लौटता है तो पहले नाव पर और फिर ट्रेन में उन दृश्यों में बिना कुछ कहे वे बहुत कुछ कह गए हैं। दृश्य के अन्त में जब मोहन पानी खरीद कर पीता है, वह मेरी हाल की याददाश्त में सबसे प्रभावी दृश्यों में से है। कहते हैं समझदार को इशारा काफ़ी होता है। अधिकतर हिंदी फ़िल्मकार या तो हमें समझदार नहीं समझते या उन्हें इशारा करना नहीं आता। शुक्र है कि इस फ़िल्मे में इस 'इशारे' की वापसी के संकेत दिखते हैं।
गायत्री जोशी बेहद प्रभावित करती हैं। जहाँ उन्हें नए चेहरे का फ़ायदा मिला है वहीं अभिनय में परिपक्वता भी दिखती है। पर उनका रोना-धोना थोड़ा कमज़ोर है। शाहरुख बिना किसी हिचक के इस फ़िल्म को अपनी सर्वश्रेष्ठ भूमिका और सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करार दे सकते हैं। वैसे सर्वश्रेष्ठ की बजाय एकमात्र श्रेष्ठ कहना भी कुछ गलत नहीं होगा। अभिनय के अलावा एक और चीज जो इस फ़िल्म को सफल बनाती है वह है इसकी पटकथा और उससे भी ज़्यादा इसके संवाद। पात्र बड़े स्वाभाविक लगते हैं। सब वही भाषा बोल रहे हैं जो करोड़ों लोग रोज शहरों, कस्बों और गाँवों में आम बोलचाल में बोलते हैं। संवाद की शक्ति इस फ़िल्म में उभर कर आती है। मेरा मानना है कि किसी कहानी या फ़िल्म के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है किरदारों को विश्वसनीय बनाना। और संवाद, उनकी बोली और लहजा वो जादू की छड़ी है जो अगर ठीक से चलाई जाए तो हाथों-हाथ देखने वाले को पात्रों से जोड़ देती है। के पी सक्सेना ने लगान में भी यह कर दिखाया था और यहाँ भी वे पूरे सफल रहे हैं।
फ़िल्म के गाने मुझे फ़िल्म में बेहतर लगे। शुक्र है कि आशुतोष उन दिग्दर्शकों में से हैं जिन्हें गाने की ताकत का अन्दाज़ा है और उससे भी महत्वपूर्ण यह कि वे गाने के माध्यम से अपनी कहानी को आगे बढ़ाना जानते हैं। पिछले काफ़ी अर्से से रहमान की धुनें मुझे कुछ खास रुचिकर नहीं लगीं, पर पार्श्वसंगीत के मामले में मैं उन्हें अभी भी सबसे बेहतर उपलब्ध संगीतकारों में शुमार करता हूँ। इस फ़िल्म का पार्श्वसंगीत भी अपनी पारदर्शिता और भराव की वजह से अच्छा असर छोड़ता है।
पर यह भी सच नहीं कि स्वदेस एक सम्पूर्ण फ़िल्म है। कुल मिलाकर करीब ८-१० मिनट की फ़िल्म ऐसी है जो बाकी फ़िल्म के स्तर से मेल नहीं खाती। मसलन, नासा में फ़िल्माए अधिकतर दृश्य सपाट हैं। निर्देशक अमरीकी अभिनेताओं को अच्छी तरह 'हैंडल' नहीं कर पाए हैं। इसी तरह वृद्धाश्रम का दृश्य बड़ा ही कमज़ोर है, शायद नौसिखिया कलाकारों की वजह से। हालाँकि बाकी फ़िल्म में आशुतोष ने सहायक कलाकारों से कमाल का काम लिया है। एक और दृश्य जो मेरे खयाल में थोड़ा 'कच्चा' रह गया, वह है दशहरे वाले दिन मोहन भार्गव का गाँव के लोगों से "भारत की महानता" के बारे में मतभेद। मुझे लगता है कि यह फ़िल्म के सबसे महत्वपूर्ण दृश्यों में से था और इसे और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता था। पर ऐसे सीन गिने-चुने हैं। तीन घंटे से अधिक के आनन्द में ये कुछ पल खास बाधा नहीं डालते।
मैं जानता हूँ कि लम्बाई की वजह से फ़िल्म की आलोचना हुई है। यहाँ तक कि उनके द्वारा भी जिन्हें फ़िल्म वैसे पसंद आई है। मुझे नहीं लगता कि यह आलोचना जायज़ है। फ़िल्म लंबी ज़रूर चलती है, पर थकती नहीं। उद्देश्य यह नहीं होता कि फ़िल्म लंबी न हो, बल्कि यह होता है कि उबाऊ न हो। स्वदेस बिल्कुल अन्त तक ताजा और रुचिकर रहती है। एकाध क्षण ऐसे आते हैं जब थोड़ी बेचैनी होती है या घड़ी की तरफ़ ध्यान जाता है (जैसे अन्त के आसपास नासा वाला सीन थोड़ा-सा लम्बा खिंच गया है), पर बड़ी जल्दी ही फ़िल्म पटरी पर वापस आ जाती है।
मेरे विचार में गम्भीर फ़िल्मों का निर्माण-मूल्यों से लैस होना हिन्दी फ़िल्मों के लिए एक दुर्लभ संयोग है। और जब ऐसा हो तो यह ख़ुशी का कारण है, और उम्मीद का भी। स्वदेस मेरे खयाल से ऐसी ही घटना है।
अन्त में आशुतोष से एक अनुरोध : भाई मेरे, जो कर रहे हो, जैसे कर रहे हो, वैसे ही करते रहो। कारण कि बिल्कुल सही-सही कर रहे हो। एक बात और। ये 'स्वदेश' नाम में क्या बुराई थी लाला? तत्सम-तद्भव ऐसे 'मिक्स' करने की क्या ज़रूरत आ पड़ी। अगर इतनी ही ठेठ होने की पड़ी थी तो 'अपना देस' कह लेते। 'स्व' संस्कृत का उपसर्ग है, इसे हर हिंदी शब्द के साथ नहीं जोड़ा जाता। यह किसी तत्सम के साथ ही जाता है। कभी 'स्व-गाँव' सुना है? क्या है कि आँख-कान को थोड़ा खटकता है। बाकी तुम्हारी फ़िल्म है, जो मर्जी नाम रखो। नाम का यही तो फ़ायदा है कि उसका कोई अर्थ निकलना ज़रूरी नहीं, न ही सही होना। इसी 'टेक्नीकॅलिटि' के चलते बच गए इस बार। पर इसका और फ़ायदा मत उठाना, भाई।
Monday, December 01, 2003
Calcutta Mail, 2003 (*) - Hard to believe it was directed by Sudhir 'Is Raat Ki Subah Nahin' Mishra. Or was it the ill health and death of Renu Saluja -- his wife and one of the most wonderful and prolific film editors that Hindi Films have seen?
The only bright moments of the film are provided by the lead actors Rani Mukherjee, Satish Kaushik and Anil K, though even these guys add their share to the mediocrity at times. Manisha Koirala is 'unjhelable' as always with her highly irritating, whispering dialogue delivery. And what is with the children in Hindi movies these days.
The only bright moments of the film are provided by the lead actors Rani Mukherjee, Satish Kaushik and Anil K, though even these guys add their share to the mediocrity at times. Manisha Koirala is 'unjhelable' as always with her highly irritating, whispering dialogue delivery. And what is with the children in Hindi movies these days.
Subscribe to:
Posts (Atom)