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Sunday, June 17, 2007

शूटर (2007)

Shooter

वाशिंगटन पोस्ट के पुलित्ज़र विजेता फ़िल्मालोचक स्टीवन हंटर के उपन्यास पर आधारित. पूर्वसैनिक, कुशल निशानेबाज़ बॉब ली स्वैगर उनके उपन्यासों का नायक है. अभी तक इस नायक के साथ वे तीन उपन्यास लिख चुके हैं और यह फ़िल्म पहले उपन्यास पर आधारित है. यानि यह एक नयी रैम्बो-नुमा शृंखला की शुरुआत हो सकती है. फ़िल्म चुस्त और तेज़ है. मार्क वॉलबर्ग बॉब ली स्वैगर की भूमिका में जँचते हैं. पर कुल मिलाकर कहानी और पटकथा आम हॉलीवुडी महानायकीय फ़िल्मों के फ़ॉर्मूले से बँधे हैं. मज़ेदार पर साधारण.

Monday, June 04, 2007

पर्फ़्यूम - द स्टोरी ऑफ़ अ मर्डरर (2006)

Perfume - The Story of A Murderer (2006)

कहानी 18 वीं सदी के फ़्रांस की है; एक ऐसे अतिमानवीय व्यक्ति की जो कीचड़ में जन्मा है (शब्दशः) पर जिसकी घ्राणशक्ति विलक्षण है. वह दुनिया भर की ख़ुशबुओं को पहचान सकता है और उन्हें अलग-अलग याद रख सकता है. उसके दिमाग में ख़ुशबुएँ ज़्यादा हैं उन्हें देने के लिए नाम कम. और उसकी अपनी कोई गंध नहीं है.

वह चाहता है ऐसा गुर जानना जिससे ज़िंदा चीज़ों की ख़ुशबू को सहेज कर रखा जा सके. और यह चाहत उसे स्याह रास्तों की तरफ़ मोड़ देती है.

एक अच्छी कहानी बढ़िया तरीके से सुनाई हुई. तकनीकी रूप से भी फ़िल्म उम्दा है. 18 वीं सदी का पैरिस अपनी समूची सुगंधों के साथ मौजूद है. पार्श्वसंगीत दृष्यों को गहराई देता है. फ़िल्म एक बेहद लोकप्रिय उपन्यास पर आधारित है. निर्देशक हैं रन लोला रन वाले टॉम टाइक्वर.

फ़िल्म के कमज़ोर पक्षों में आश्चर्यजनक रूप से डस्टिन हॉफ़मैन हैं. और क्लाइमैक्स भी मुझे कुछ हल्का लगा, पर बहुत थोड़ा सा.

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Monday, May 14, 2007

द नेमसेक | The Namesake (2007)

अमेरिकी आप्रवासियों और उनकी समस्याओं को फ़िल्म कई सतहों पर छूती है. पर सतह से आगे नहीं बढ़ पाती. फ़िल्म के कथानक (सूनी तारापोरवाला) में और गहरे जाने का अवकाश था. इसके बावजूद फ़िल्म रोचक है और गुदगुदाते संवादों से ध्यान खींचे रखती है. किताब (झुम्पा लाहिड़ी लिखित) के मूल कथ्य के साथ भी न्याय करती है.

मीरा नायर (निर्देशक) अंग्रेज़ी दर्शकों के भारत संबंधी पूर्वाग्रहों को भुनाती ही दिखती हैं. चाहे वे कलकत्ता की सड़कों के सीन हों या ताजमहल के दृश्य, कैमरा (फ़्रेड्रिक एम्स) इन्हें टूरिस्टी नज़रिये से निहारता लगता है. पर कुछ दृश्य संवेदनशीलता और प्रभावी तरीके से फ़िल्माए गए हैं.

तकनीकी और तथ्यात्मक ग़लतियाँ कई हैं. जैसे न्यू यॉर्क से कलकत्ता की उड़ान के लिए एयर इंडिया की जगह इंडियन एयरलाइंस (जोकि भारत की घरेलू एयर सेवा है) का जहाज दिखाना. 1977 के कलकत्ता में द टेलीग्राफ़ का बोर्ड (बड़ी प्रमुखता से) दिखता है, जो 1982 में शुरू हुआ था. ग़लतियाँ इतनी स्पष्ट हैं कि फ़िल्म देखते वक़्त ही खटकती हैं.

अभिनेताओं में तब्बू कमाल है. इरफ़ान ख़ान ने भी, जैसी उनसे अपेक्षा थी, अच्छा काम किया है. उम्मीद से उलट, कैल पेन कई जगह अतिशयता के शिकार हुए हैं. एक जगह तो (जहाँ रेल्वे स्टेशन पर वे अपनी पत्नी पर गुस्सा होते हैं) वे ऐंग्री-यंग-अमिताभ के हैंगओवर में लगते हैं.

छुट-पुट:
1) नाम-क्रम के प्रदर्शन में बाँग्ला व रोमन अक्षरों का मेल मोहक है.
2) झुम्पा लाहिड़ी ख़ुद भी कुछ देर के लिए झुम्पा मासी के तौर पर दिखती हैं.
3) फ़िल्म की भाषा पारस्थितिक है. मुख्यतया अंग्रेज़ी, पर कई अवसरों पर बाँग्ला. एकाध डायलॉग हिंदी में भी हैं.
4) फ़िल्म के एक सीन में ये मेरा दीवानापन है (यहूदी) का एक हास्यास्पद रीमिक्स संस्करण बजता है. सीन दिलचस्प है.

IMDB कड़ी