कल दुबारा 'स्वदेस' देखी। इससे पहले एक लम्बे अर्से में मुझे ऐसी कोई फ़िल्म याद नहीं आती, जो छह महीने के अन्तराल में दो बार साढ़े तीन घंटे तक मुझे बिठा के रख सकी हो। और यह तब है जबकि शाहरुख खान का नाम सुनते ही मुझे छींकें शुरू हो जाती हैं।
फ़िल्म की सबसे खास बात मुझे इसका असलीपन लगा। पात्रों, घटनाओं, मुद्दों से लेकर गलियों, घरों, भाषा और लहजे तक सब बहुत वास्तविक और सच्चे लगते हैं। और फिर भी कहानी का जो अपना 'larger-than-life'
आशुतोष गोवारिकर अपनी पीढ़ी के महान निर्देशकों में नाम लिखाने की ओर अग्रसर हैं। 'लगान' शायद ज़्यादा मनोरंजक फ़िल्म थी, पर 'स्वदेस' अधिक विचारोत्तेजक और गहन है। गम्भीर, सामयिक और मुद्दों पर आधारित सिनेमा है। अपने समय की 'दो बीघा ज़मीन' है। पर इनकी ये दोनों फ़िल्में सिनेमाई उत्कृष्टता और अच्छी कही कहानी का श्रेष्ठ उदाहरण हैं। उनकी निर्देशकीय प्रतिभा अब तुक्के की बात नहीं रही। उन्होंने इसे सिद्ध कर दिया है। स्वदेस से ही एक विशेष उदाहरण लें। फ़िल्म में जब मोहन भार्गव (शाहरुख) हरिदास के गाँव से बिना किराया वसूले वापस लौटता है तो पहले नाव पर और फिर ट्रेन में उन दृश्यों में बिना कुछ कहे वे बहुत कुछ कह गए हैं। दृश्य के अन्त में जब मोहन पानी खरीद कर पीता है, वह मेरी हाल की याददाश्त में सबसे प्रभावी दृश्यों में से है। कहते हैं समझदार को इशारा काफ़ी होता है। अधिकतर हिंदी फ़िल्मकार या तो हमें समझदार नहीं समझते या उन्हें इशारा करना नहीं आता। शुक्र है कि इस फ़िल्मे में इस 'इशारे' की वापसी के संकेत दिखते हैं।
गायत्री जोशी बेहद प्रभावित करती हैं। जहाँ उन्हें नए चेहरे का फ़ायदा मिला है वहीं अभिनय में परिपक्वता भी दिखती है। पर उनका रोना-धोना थोड़ा कमज़ोर है। शाहरुख बिना किसी हिचक के इस फ़िल्म को अपनी सर्वश्रेष्ठ भूमिका और सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करार दे सकते हैं। वैसे सर्वश्रेष्ठ की बजाय एकमात्र श्रेष्ठ कहना भी कुछ गलत नहीं होगा। अभिनय के अलावा एक और चीज जो इस फ़िल्म को सफल बनाती है वह है इसकी पटकथा और उससे भी ज़्यादा इसके संवाद। पात्र बड़े स्वाभाविक लगते हैं। सब वही भाषा बोल रहे हैं जो करोड़ों लोग रोज शहरों, कस्बों और गाँवों में आम बोलचाल में बोलते हैं। संवाद की शक्ति इस फ़िल्म में उभर कर आती है। मेरा मानना है कि किसी कहानी या फ़िल्म के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है किरदारों को विश्वसनीय बनाना। और संवाद, उनकी बोली और लहजा वो जादू की छड़ी है जो अगर ठीक से चलाई जाए तो हाथों-हाथ देखने वाले को पात्रों से जोड़ देती है। के पी सक्सेना ने लगान में भी यह कर दिखाया था और यहाँ भी वे पूरे सफल रहे हैं।
फ़िल्म के गाने मुझे फ़िल्म में बेहतर लगे। शुक्र है कि आशुतोष उन दिग्दर्शकों में से हैं जिन्हें गाने की ताकत का अन्दाज़ा है और उससे भी महत्वपूर्ण यह कि वे गाने के माध्यम से अपनी कहानी को आगे बढ़ाना जानते हैं। पिछले काफ़ी अर्से से रहमान की धुनें मुझे कुछ खास रुचिकर नहीं लगीं, पर पार्श्वसंगीत के मामले में मैं उन्हें अभी भी सबसे बेहतर उपलब्ध संगीतकारों में शुमार करता हूँ। इस फ़िल्म का पार्श्वसंगीत भी अपनी पारदर्शिता और भराव की वजह से अच्छा असर छोड़ता है।
पर यह भी सच नहीं कि स्वदेस एक सम्पूर्ण फ़िल्म है। कुल मिलाकर करीब ८-१० मिनट की फ़िल्म ऐसी है जो बाकी फ़िल्म के स्तर से मेल नहीं खाती। मसलन, नासा में फ़िल्माए अधिकतर दृश्य सपाट हैं। निर्देशक अमरीकी अभिनेताओं को अच्छी तरह 'हैंडल' नहीं कर पाए हैं। इसी तरह वृद्धाश्रम का दृश्य बड़ा ही कमज़ोर है, शायद नौसिखिया कलाकारों की वजह से। हालाँकि बाकी फ़िल्म में आशुतोष ने सहायक कलाकारों से कमाल का काम लिया है। एक और दृश्य जो मेरे खयाल में थोड़ा 'कच्चा' रह गया, वह है दशहरे वाले दिन मोहन भार्गव का गाँव के लोगों से "भारत की महानता" के बारे में मतभेद। मुझे लगता है कि यह फ़िल्म के सबसे महत्वपूर्ण दृश्यों में से था और इसे और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता था। पर ऐसे सीन गिने-चुने हैं। तीन घंटे से अधिक के आनन्द में ये कुछ पल खास बाधा नहीं डालते।
मैं जानता हूँ कि लम्बाई की वजह से फ़िल्म की आलोचना हुई है। यहाँ तक कि उनके द्वारा भी जिन्हें फ़िल्म वैसे पसंद आई है। मुझे नहीं लगता कि यह आलोचना जायज़ है। फ़िल्म लंबी ज़रूर चलती है, पर थकती नहीं। उद्देश्य यह नहीं होता कि फ़िल्म लंबी न हो, बल्कि यह होता है कि उबाऊ न हो। स्वदेस बिल्कुल अन्त तक ताजा और रुचिकर रहती है। एकाध क्षण ऐसे आते हैं जब थोड़ी बेचैनी होती है या घड़ी की तरफ़ ध्यान जाता है (जैसे अन्त के आसपास नासा वाला सीन थोड़ा-सा लम्बा खिंच गया है), पर बड़ी जल्दी ही फ़िल्म पटरी पर वापस आ जाती है।
मेरे विचार में गम्भीर फ़िल्मों का निर्माण-मूल्यों से लैस होना हिन्दी फ़िल्मों के लिए एक दुर्लभ संयोग है। और जब ऐसा हो तो यह ख़ुशी का कारण है, और उम्मीद का भी। स्वदेस मेरे खयाल से ऐसी ही घटना है।
अन्त में आशुतोष से एक अनुरोध : भाई मेरे, जो कर रहे हो, जैसे कर रहे हो, वैसे ही करते रहो। कारण कि बिल्कुल सही-सही कर रहे हो। एक बात और। ये 'स्वदेश' नाम में क्या बुराई थी लाला? तत्सम-तद्भव ऐसे 'मिक्स' करने की क्या ज़रूरत आ पड़ी। अगर इतनी ही ठेठ होने की पड़ी थी तो 'अपना देस' कह लेते। 'स्व' संस्कृत का उपसर्ग है, इसे हर हिंदी शब्द के साथ नहीं जोड़ा जाता। यह किसी तत्सम के साथ ही जाता है। कभी 'स्व-गाँव' सुना है? क्या है कि आँख-कान को थोड़ा खटकता है। बाकी तुम्हारी फ़िल्म है, जो मर्जी नाम रखो। नाम का यही तो फ़ायदा है कि उसका कोई अर्थ निकलना ज़रूरी नहीं, न ही सही होना। इसी 'टेक्नीकॅलिटि' के चलते बच गए इस बार। पर इसका और फ़ायदा मत उठाना, भाई।
Wednesday, May 11, 2005
स्वदेस - दूसरे दौर की समीक्षा
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5 comments:
विनय जी
हम भी कुछ समय पहले स्वदेस पर कुछ एह कहे थे
"मुझे बहुत पंसद आया। गर आप फिल्म मजे के लिए देखने जा रहे हो तो भाई न ही जाओ। पर यदि आप एक आप्रवासी भारतीय की अपनी जड़ों से जुड़ने की जद्दोजहद की कहानी, कुछ बेहतर अदाकारी और जिंदगी देखना चाहते हैं तो जरुर देखिए।"
पंकज
पंकज,
आपकी समीक्षा पढ़ी। बिल्कुल १००% सहमत हूँ। मेरे खयाल से फ़िल्म में आप्रवासी भारतीय वाला कोण इतना भी तिरछा नहीं कि एक आम भारतीय उससे identify न कर सके।
निर्देशन का लोहा मानना पड़ेगा कि आप को भी वही सीन पसंद आया जो कि मुझे आया था।
अरे, विनय, ये आप तो सचमुच बड़े भावुक हो गए! इतना कुछ देख-पढ़ लिया आपने! एक सीधी सी बात बताइये, कथ्य को लेकर ऐसी ही निष्ठा थी आशुतोष में तो यूपी जाके शूट क्यों नहीं किया. नहीं किया ठीक है, चलिए, महाराष्ट्र में ही काम करना था, करते, फिर अपनी कहानी के नायक को भी मराठी बना डालते. इतना तो कर सकते थे? इतना तो सी ग्रेड हॉलीवुड की फ़िल्में भी करना ज़रूरी समझती हैं, नहीं?
अलग से एक छोटी-सी गुजारिश है. आपका ई-मेल क्या है. असुविधा न हो तो indiaroad@gmail.com पर एक मेल डाल दीजिएगा.
प्रमोद जी,
फ़िल्म आख़िर एक मेक-बिलीव माध्यम है. अगर फ़िल्म देखने वालों को लगता है कि यूपी की बात बोलकर यूपी दिखाया गया है तो फिर ये बात कोई मायने नहीं रखती कि असल में वह महाराष्ट्र है. ख़ासकर इसलिये भी कि फ़िल्म में स्थान की महत्ता विशिष्ट नहीं पारिस्थितिक (इन्सिडेंटल) है. फ़िल्म का गाँव भारत के एक बड़े हिस्से का कोई भी गाँव हो सकता है. मुझे याद नहीं फ़िल्म में ऐसी कोई ग़लती थी, पर हो सकता है मैं ग़लत होऊँ (अब याददाश्त पर इतना भरोसा नहीं रहा).
फ़िल्म की विशेषताओं में मैंने दर्शक को बुद्धू न समझने की बात का ज़िक्र किया है. निर्देशकीय ईमानदारी भी इसी से जुड़ी बात है. मुझे यही लगा कि आशुतोष ईमानदार रहे हैं और वह भी असाधारण तौर पर.
हॉलीवुड से तुलना को मैं जायज़ नहीं समझता. इस समीक्षा में मेरा परिप्रेक्ष्य घेरा हिन्दी फ़िल्मों का ही रहा है. और इसमें शक नहीं कि उस घेरे में भी फ़िल्म में कई कमज़ोरियाँ हैं. दो एक बातों का ज़िक्र किया भी है मैंने.
फ़िल्म को लेकर मेरी ख़ुशी में भावुकता हो न हो, उम्मीद का पुट ज़रूर है. और शायद इस बात का भी कि बावजूद शाहरुख़ के मैं फ़िल्म दो बार देख पाया :).
पुनश्च: ई-मेल पता अलग से भेज रहा हूँ.
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