"मेरी फ़िल्मों के लोग बिल्कुल मेरे जैसे ही होते हैं, सहजबुद्धि वाले, अपेक्षाकृत कम बौद्धिक क्षमता वाले लोग, जो अगर सोचते भी हैं तो तभी जब वे बात कर रहे होते हैं."- इंगमार बर्गमैन
मानवीय संवेदनाओं और रिश्तों पर गहरी, अक्सर दर्दनाक, पर अद्भुत फ़िल्में बनाने वाले स्वीडिश फ़िल्मकार इंगमार बर्गमैन नहीं रहे. वे 89 के थे.
बड़ी अजीब सी बात है कि इसी शनिवार (यानि परसों ही) मैं उनकी अंतिम फ़िल्मों में से एक 1978 में बनी ऑटम सोनाटा (Autumn Sonata) देख रहा था. शायद उसी वक्त जब वो अपने अंतिम सफ़र की तैयारी में थे. सोच कर सिहरन होती है.
सिनेमाई उत्कृष्टता की मिसाल.
एक अधेड़ आदमी ख़ुदकुशी करना चाहता है और उसके लिए एक मददगार ढूँढ रहा है. प्लॉट पूरी तरह गले नहीं उतरता और दिलचस्पी घटाता है. दृश्य थोड़े खिंचे हुए हैं. संवाद कुछ जगह अपनी सहजता की वजह से अच्छे लगते हैं पर कई जगह ख़ुदकुशी के ख़िलाफ़ पुराने, घिसे-पिटे तर्कों को गूढ़ विचारों की तरह पेश किया गया है.
कमाल का प्रयोग. फ़िल्म ईरान और बहरीन के बीच खेले गए पिछले फ़ुटबॉल विश्व-कप योग्यता मैच के साथ-साथ चलती है. कहानी और पात्रों का व्यवहार मैच की घटनाओं से प्रभावित होता रहता है. और फ़िल्म वहीं मैच के बीच शूट की गई है. डॉक्यूमेंटरी-नुमा फ़िल्मांकन के बीच कई कलाकारों का अभिनय बेजोड़ है. सोचिये अगर तो अन्दाज़ा लगाना मुश्किल है कि फ़िल्म और इसकी कहानी कैसे सोची गई होगी. योजना और इम्प्रोवाइज़ेशन के बीच कितने कमाल का इंटरऐक्शन रहा होगा. इतने इम्प्रोवाइज़ेशन के बाद इतनी दिलचस्प फ़िल्म बना पाना ही जफ़र पनाही की सफलता है.