Sunday, June 10, 2007

एक चालीस की लास्ट लोकल (2007)

पता नहीं कैसी है. 20 मिनट से आगे नहीं देख झेल पाया...

88 मिनट्स (2007)

88 Minutes

एल पचीनो. "88 मिनट में उसे एक ख़ून की गुत्थी सुलझानी है." अच्छा प्लॉट पर कमजोर रुपांतरण. फ़िल्म तेज़ चलती है पर अंत में संतुष्ट नहीं छोड़ती.

Monday, June 04, 2007

लाइफ़ इन ए मेट्रो (2007)

माना कि 60 के अमेरिका जैसा क्यूबिकल-संसार अब भारत में भी पसर रहा है. पर इसका मतलब यह तो नहीं कि फ़िल्मों के प्लॉट भी वहीं से उधारी लिए जाएँ. और उधारी भी कहाँ, चोरी, बल्कि चोरी भी क्या, डकैती! ऑरिजिनल चिंतन नाम की चीज़ मुम्बई में बची है कि नहीं?

फ़िल्म की प्रस्तावना ('प्रेमिस') ही दुरुस्त नहीं, बाक़ी का क्या कहिये. वही भेजा फ़्राय वाला हिसाब. 1960 की अमेरिकी फ़िल्म द अपार्टमेंट, जो कि एक निहायत मज़ेदार और ईमानदार फ़िल्म थी, का प्लॉट यूँ का यूँ मुम्बई में चिपका दिया है अनुराग बसु ने. भाई मेरे, महज भाषा बदलने से कल्चर अनुवादित नहीं होता.

ऊपर से निर्देशकीय नौसिखियेपन के उदाहरण बिखरे पड़े हैं फ़िल्म में. मिसाल देखिये (चेतावनी - आगे रहस्योदघाटन है). कोंकणा को उसका बॉस जब पहली बार ऑफ़िस (या जिम?) में बुलाता है तो फ़्रेम में उसके पीछे ब्रोकबैक माउण्टेन का पोस्टर लगा दिखता है. अब लीजिए. जो रहस्य फ़िल्म में 15 मिनट बाद इन्हें सनसनीखेज़ तरीके से खोलना है, उसकी वे यहीं बत्ती लगा देते हैं. (चेतावनी समाप्त) अनुराग बाबू, समझदार निर्देशक ऐसे चोंचले नहीं करता, फ़िल्म की क़ीमत पर तो कतई नहीं.

और एक ये प्रीतम एण्ड कंपनी. हर 20 मिनट में किसी चौराहे पर अपने बैंड के साथ गिटार लेकर आ जाते हैं. नहीं, 2-3 बार ठीक लगता है (ख़ासकर 'इन दिनों' सुनने में भला लगता है) पर फिर झुंझलाहट होने लगती है. अच्छे निर्देशक की एक ख़ूबी ये होती है कि उसे पता होता है कि कहाँ रुकना है.

पर एक बात अच्छी लगी अनुराग की. हालाँकि कुछ देर तक वो यथार्थ का नाटक ज़रूर करते हैं, क्लाइमैक्स तक आते-आते जब उनकी पोल-पट्टी खुलने लगती है, बड़ी ईमानदारी से मान जाते हैं कि भई मैं तो मज़ाक़ कर रहा था. कहाँ का सच, कौन सा यथार्थ. छोड़ो यार .. मुझे इरफ़ान को घोड़े पर शहर में भगाने दो.

नहीं नहीं ग़लत मत समझें. फ़िल्म बुरी नहीं है. अच्छा टाइम-पास है. इरफ़ान और कोंकणा फ़िल्म को देखने लायक बनाते हैं. इनकी अदाकारी में इम्प्रोवाइज़ेशन का अच्छा खासा पुट दिखता है. कोंकणा निश्चय ही अपने वक़्त की बेहतरीन अभिनेत्रियों में से हैं. तो अगर आम मसाला फ़िल्मों से कोई ख़ास आपत्ति न हो तो फ़िल्म आराम से देखिये. बुरी नहीं है. पर ऐसा अनुराग बसु की वजह से नहीं है, उनके बावजूद है.

मेरी कई बातों को कहीं बेहतर तरीके से समझाया है सिलेमा वाले साब जी ने. उनसे बस इतना ही कहना है कि फ़िल्म इस लायक नहीं कि इस पर कोई गंभीर बहस हो. इसलिए चाय खत्म कीजिए, आगे चलते हैं.

पर्फ़्यूम - द स्टोरी ऑफ़ अ मर्डरर (2006)

Perfume - The Story of A Murderer (2006)

कहानी 18 वीं सदी के फ़्रांस की है; एक ऐसे अतिमानवीय व्यक्ति की जो कीचड़ में जन्मा है (शब्दशः) पर जिसकी घ्राणशक्ति विलक्षण है. वह दुनिया भर की ख़ुशबुओं को पहचान सकता है और उन्हें अलग-अलग याद रख सकता है. उसके दिमाग में ख़ुशबुएँ ज़्यादा हैं उन्हें देने के लिए नाम कम. और उसकी अपनी कोई गंध नहीं है.

वह चाहता है ऐसा गुर जानना जिससे ज़िंदा चीज़ों की ख़ुशबू को सहेज कर रखा जा सके. और यह चाहत उसे स्याह रास्तों की तरफ़ मोड़ देती है.

एक अच्छी कहानी बढ़िया तरीके से सुनाई हुई. तकनीकी रूप से भी फ़िल्म उम्दा है. 18 वीं सदी का पैरिस अपनी समूची सुगंधों के साथ मौजूद है. पार्श्वसंगीत दृष्यों को गहराई देता है. फ़िल्म एक बेहद लोकप्रिय उपन्यास पर आधारित है. निर्देशक हैं रन लोला रन वाले टॉम टाइक्वर.

फ़िल्म के कमज़ोर पक्षों में आश्चर्यजनक रूप से डस्टिन हॉफ़मैन हैं. और क्लाइमैक्स भी मुझे कुछ हल्का लगा, पर बहुत थोड़ा सा.

IMDB कड़ी

Monday, May 14, 2007

द नेमसेक | The Namesake (2007)

अमेरिकी आप्रवासियों और उनकी समस्याओं को फ़िल्म कई सतहों पर छूती है. पर सतह से आगे नहीं बढ़ पाती. फ़िल्म के कथानक (सूनी तारापोरवाला) में और गहरे जाने का अवकाश था. इसके बावजूद फ़िल्म रोचक है और गुदगुदाते संवादों से ध्यान खींचे रखती है. किताब (झुम्पा लाहिड़ी लिखित) के मूल कथ्य के साथ भी न्याय करती है.

मीरा नायर (निर्देशक) अंग्रेज़ी दर्शकों के भारत संबंधी पूर्वाग्रहों को भुनाती ही दिखती हैं. चाहे वे कलकत्ता की सड़कों के सीन हों या ताजमहल के दृश्य, कैमरा (फ़्रेड्रिक एम्स) इन्हें टूरिस्टी नज़रिये से निहारता लगता है. पर कुछ दृश्य संवेदनशीलता और प्रभावी तरीके से फ़िल्माए गए हैं.

तकनीकी और तथ्यात्मक ग़लतियाँ कई हैं. जैसे न्यू यॉर्क से कलकत्ता की उड़ान के लिए एयर इंडिया की जगह इंडियन एयरलाइंस (जोकि भारत की घरेलू एयर सेवा है) का जहाज दिखाना. 1977 के कलकत्ता में द टेलीग्राफ़ का बोर्ड (बड़ी प्रमुखता से) दिखता है, जो 1982 में शुरू हुआ था. ग़लतियाँ इतनी स्पष्ट हैं कि फ़िल्म देखते वक़्त ही खटकती हैं.

अभिनेताओं में तब्बू कमाल है. इरफ़ान ख़ान ने भी, जैसी उनसे अपेक्षा थी, अच्छा काम किया है. उम्मीद से उलट, कैल पेन कई जगह अतिशयता के शिकार हुए हैं. एक जगह तो (जहाँ रेल्वे स्टेशन पर वे अपनी पत्नी पर गुस्सा होते हैं) वे ऐंग्री-यंग-अमिताभ के हैंगओवर में लगते हैं.

छुट-पुट:
1) नाम-क्रम के प्रदर्शन में बाँग्ला व रोमन अक्षरों का मेल मोहक है.
2) झुम्पा लाहिड़ी ख़ुद भी कुछ देर के लिए झुम्पा मासी के तौर पर दिखती हैं.
3) फ़िल्म की भाषा पारस्थितिक है. मुख्यतया अंग्रेज़ी, पर कई अवसरों पर बाँग्ला. एकाध डायलॉग हिंदी में भी हैं.
4) फ़िल्म के एक सीन में ये मेरा दीवानापन है (यहूदी) का एक हास्यास्पद रीमिक्स संस्करण बजता है. सीन दिलचस्प है.

IMDB कड़ी

Friday, May 11, 2007

भेजा फ्राय (2007)

फ़िल्म इस बात की मिसाल है कि एक अच्छा अभिनेता और एक अच्छी परफ़ॉर्मेंस किसी औसत, बल्कि घटिया, फ़िल्म को भी मनोरंजक बना सकते हैं. विनय पाठक अभी तक की श्रेष्ठतम कॉमिक अदायगियों में से एक के साथ अकेले दम पर फ़िल्म को देखने लायक बनाते हैं. सिर्फ़ देखने लायक ही नहीं, ठहाकों से भरपूर.

लगभग बिना कहानी वाली यह फ़िल्म एक शाम की घटना पर आधारित है. फ़्रांसीसी फ़िल्म 'द डिनर गेम' (अंग्रेज़ी शीर्षक) से उड़ाया गया प्लॉट भारतीय संदर्भों में नहीं जँचता और पटकथा में अविश्वसनीयता का भाव लाता है.

बाक़ी ऐक्टरों में रजत कपूर हमेशा की तरह संतुलित हैं. रणवीर शूरी छोटे से रोल में हैं और थोऽऽड़ा ओवर-द-टॉप हुए हैं. मिलिंद सोमन इतने बुरे ऐक्टर हैं ये मुझे पता नहीं था. सारिका ठीक हैं, कम से कम आज के कमल हासन से बेहतर. काफ़ी दिनों बाद उन्हें पर्दे पर देखकर अच्छा लगा.

विनय पाठक के लिए देखने वाली फ़िल्म. पुराने हिंदी गानों के शौकीनों को और मज़ा आयेगा.

Tuesday, September 19, 2006

१०० आवश्यक फ़िल्में

उर्फ़
१०० फ़िल्में जिन्हें देखे बिना हिंदी सिनेमा पर सार्थक बहस नहीं की जा सकती(जिम एमर्सन की अँगरेज़ी सूची से प्रेरित)

यह महान फ़िल्मों की सूची नहीं है, हालाँकि इसकी अधिकतर फ़िल्में ऐसी किसी सूची में भी हो सकती हैं. ये वे फ़िल्में हैं जो हमारी साझा सिनेमाई विरासत का हिस्सा हैं. जिनके बारे में यह समझा जा सकता है कि इन्हें एक प्रबुद्ध सिनेमा दर्शक ने देखा होगा.

इस सूची में सिर्फ़ स्वातंत्र्योत्तर प्रदर्शित फ़िल्में शामिल हैं, क्योंकि उससे पहले की फ़िल्मों को दायरे में लेना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल होता. कारण उस दौर से अनभिज्ञता तो है ही, यह भी है कि उस दौर की फ़िल्में अब आसानी से उपलब्ध नहीं हो पातीं. इसके अलावा और कई कारणों से भी, जिसमें कई कलाकारों का पाकिस्तान चले जाना शामिल है, वर्ष १९४७ हिंदी सिनेमा में एक विभाजक वर्ष है. इतना ज़रूर कहना चाहूँगा कि अगर १९४७-पूर्व की फ़िल्में भी इसमें जुड़तीं तो मैं ये कुछ फ़िल्में पहले जोड़ता: अछूत कन्या, क़िस्मत, डॉ कोटनीस की अमर कहानी, पुकार, सिकंदर.

मेरी कोशिश रही है कि महत्त्वपूर्ण विधाओं, मुद्दों, निर्देशकों, अभिनेताओं, प्रयोगों और हर काल को उचित प्रतिनिधित्व मिले. साथ ही मैंने यह भी ध्यान रखने की कोशिश की है कि चयनित फ़िल्में व्यापक तौर पर मौलिक हों.

ज़ाहिर है कि मेरी सूची है तो इसमें मेरी पसंद की फ़िल्में होंगी. पर मैं ज़रूर जानना चाहूँगा कि ऐसी कौन-सी फ़िल्में हैं जो आप इस सूची में जोड़ते, और किन फ़िल्मों को हटाकर.

1974 अंकुर - श्याम बेनेगल
1982 अंगूर - गुलज़ार
1949 अंदाज़ - महबूब ख़ान
1994 अन्दाज़ अपना अपना - राजकुमार संतोषी
1966 अनुपमा - ऋषिकेश मुकर्जी
1960 अनुराधा - ऋषिकेश मुकर्जी
1973 अभिमान - ऋषिकेश मुकर्जी
1977 अमर अकबर एंथोनी - मनमोहन देसाई
1985 अर्जुन - राहुल रवैल
1982 अर्थ - महेश भट्ट
1983 अर्ध सत्य - गोविंद निहलानी
1980 आक्रोश - गोविंद निहलानी
1975 आँधी - गुलज़ार
1970 आनन्द - ऋषिकेश मुकर्जी
1951 आवारा - राज कपूर
1987 इजाज़त - गुलज़ार
1996 इस रात की सुबह नहीं - सुधीर मिश्रा
1989 एक दिन अचानक - मृणाल सेन
1983 कथा - सई परांजपे
1976 कभी-कभी - यश चोपड़ा
1988 क़यामत से क़यामत तक - मंसूर ख़ान
1959 कागज़ के फूल - गुरू दत्त
1960 क़ानून - बी आर चोपड़ा
1972 कोशिश - गुलज़ार
1999 कौन - रामगोपाल वर्मा
1980 ख़ूबसूरत - ऋषिकेश मुकर्जी
1985 ख़ामोश - विधु विनोद चोपड़ा
1961 गंगा जमुना - नितिन बोस
1973 गरम हवा - एम एस सथ्यू
1965 गाइड - विजय आनंद
1979 गोलमाल - ऋषिकेश मुकर्जी
1975 चुपके चुपके - ऋषिकेश मुकर्जी
1958 चलती का नाम गाड़ी - सत्येन बोस
1981 चश्म-ए-बद्दूर - सई परांजपे
2001 चाँदनी बार - मधुर भंडारकर
1976 चितचोर - बासु चटर्जी
1979 जुनून - श्याम बेनेगल
1967 ज्वेल थीफ़ - विजय आनंद
1959 जागते रहो - अमित-शंभु मित्रा
1954 जाग्रति - सत्येन बोस
1983 जाने भी दो यारो - कुंदन शाह
1950 जोगन - केदार शर्मा
1963 तेरे घर के सामने - विजय आनंद
1966 तीसरी कसम - बासु भट्टाचार्य
1966 तीसरी मंज़िल - विजय आनंद
1990 थोड़ा सा रुमानी हो जाएँ - अमोल पालेकर
1955 देवदास - बिमल राय
2001 दिल चाहता है - फ़रहान अख़्तर
1975 दीवार - यश चोपड़ा
1957 दो आँखें बारह हाथ - वी शांताराम
1953 दो बीघा ज़मीन - बिमल राय
1982 नमकीन - गुलज़ार
1957 नया दौर - बी आर चोपड़ा
1968 पड़ोसन - ज्योति स्वरूप
1957 प्यासा - गुरू दत्त
1982 प्रेम रोग - राज कपूर
1989 परिंदा - विधु विनोद चोपड़ा
1988 पुष्पक - संगीतम श्रीनिवास राव
1958 फिर सुबह होगी - रमेश सहगल
1994 बैंडिट क्वीन - शेखर कपूर
1963 बन्दिनी - बिमल राय
1967 बहू बेग़म - एम सादिक़
1979 बातों बातों में - बासु चटर्जी
1972 बावर्ची - ऋषिकेश मुकर्जी
1969 भुवन शोम - मृणाल सेन
1978 मुकद्दर का सिकंदर - प्रकाश मेहरा
2003 मक़बूल - विशाल
1960 मुग़ल-ए-आज़म - के आसिफ़
1983 मंडी - श्याम बेनेगल
1957 मदर इंडिया - महबूब ख़ान
1958 मधुमती - बिमल राय
1994 मम्मो - श्याम बेनेगल
1966 मेरा साया - राज खोसला
1949 महल - कमाल अमरोही
1983 मासूम - शेखर कपूर
1985 मिर्च मसाला - केतन मेहता
1987 मिस्टर इण्डिया - शेखर कपूर
2005 रँग दे बसंती - ओम प्रकाश मेहरा
1990 लेकिन - गुलज़ार
2001 लगान - आशुतोष गोवारिकर
1991 लम्हे - यश चोपड़ा
1965 वक़्त - यश चोपड़ा
1999 वास्तव - महेश मंजरेकर
1982 विजेता - गोविंद निहलानी
1983 वो सात दिन - बापू
1982 शक्ति - रमेश सिप्पी
1977 शतरंज के खिलाड़ी - सत्यजीत राय
1973 शोले - रमेश सिप्पी
1959 सुजाता - बिमल राय
1969 सत्यकाम - ऋषिकेश मुकर्जी
1998 सत्या - रामगोपाल वर्मा
1983 सदमा - बालू महेंद्र
2004 स्वदेस - आशुतोष गोवारिकर
1985 सागर - रमेश सिप्पी
1984 सारांश - महेश भट्ट
1962 साहिब, बीवी, और ग़ुलाम - अबरार अल्वी
1981 सिलसिला - यश चोपड़ा
1964 हक़ीक़त - चेतन आनंद
1994 हम आपके हैं कौन - सूरज बड़जात्या
1962 हाफ़ टिकट - कालिदास